चैतन्य के दर्पण में, आनंद के आलय में…Jain Bhajan
“चैतन्य के दर्पण में, आनंद के आलय में” एक गहन आध्यात्मिक अनुभूति से ओत-प्रोत जैन भजन है, जो हमें अपनी भीतर स्थित शाश्वत चैतन्य शक्ति और परम आनंद के स्रोत से मिलन कराता है। इस भजन में साधक स्वयं को चैतन्य के दर्पण में निहारते हुए, आत्मा के मूल स्वभाव को पहचानने का प्रयास करता है — जो न केवल चेतन है, बल्कि आनंदमय और शुद्ध भी है।
यह भजन आत्मचिंतन, साधना और निर्विकारी दृष्टि के महत्व पर जोर देता है, ताकि प्रत्येक जीव भीतर स्थित अनंत सुख, शांति, प्रेम और मुक्ति के द्वार खोल सके। प्रत्येक पंक्ति हमें आत्मा के उसी मूल स्वरूप से जोड़ती है, जिससे प्रभु महावीर ने परिचय कराया — एक ऐसा स्वरूप, जो राग-द्वेष से परे, केवल आनंद, ज्ञान, और दर्शन से परिपूर्ण है।
चैतन्य के दर्पण में, आनंद के आलय में।
बस ज्ञान ही बस ज्ञान है, कोई कैसे बतलाए||
निज ज्ञान में बस ज्ञान है, ज्यों सूर्य रश्मि खान,
उपयोग में उपयोग है, क्रोधादि से दरम्यान |
इस भेद विज्ञान से, तुझे निर्णय करना है,
अपनी अनुभूति में, दिव्य दर्शन हो जाए ।।(1)
निज ज्ञान में पर ज्ञेय की, दुर्गंध है कहाँ,
निज ज्ञान की सुगंध में, ज्ञानी नहा रहा।
अभिनंदन अभिवादन, अपने द्वारा अपना,
अपने ही हाथों से, स्वयंवर हो जाए ।।(2)
जिस ज्ञान ने निज ज्ञान को, निज ज्ञान न जाना,
कैसे कहे ज्ञानी उसे, परसन्मुख बेगाना।
ज्ञेय के जानने में भी, बस ज्ञान प्रसिद्ध हुआ,
अपनी निधि अपने में, किसी को न मिल पाए||(3)
चैतन्य के दर्पण में, आनंद के आलय में।
बस ज्ञान ही बस ज्ञान है, कोई कैसे बतलाए||