दुनिया से में हारी, तो आयी तेरे द्वार… Jain Bhajan

“दुनिया से मैं हारी, तो आयी तेरे द्वार” एक प्रसिद्ध जैन भजन है, जो संसार के दुख-दर्द से थके मन की पुकार है। इस भजन में साधक हृदय से स्वीकार करता है कि संसार के मोह, माया और संघर्ष में हार जाने के बाद, अब केवल प्रभु के चरणों में ही उसे सच्चा सहारा, शांति और प्रेम मिलता है।

यह भजन गहराई से भगवान के चरणों में समर्पण, श्रद्धा और विनय के भाव को दर्शाता है। संसार के सभी रिश्ते और सुख क्षणिक होते हैं, पर प्रभु के दर पर सदा प्रेम, करुणा और क्षमा मिलती है — यही इस भजन का मूल संदेश है।

तर्ज – सावन का महीना…

दुनिया से मैं हारी तो आई तेरे द्वार

यहां से जो मैं हारी कहां जाऊंगी भगवान (2)

सुख में प्रभुवर तेरी याद ना आई

दुख में प्रभुवर तुमसे प्रीत लगाई

सारा दोष है मेरा 2, मैं करती हूं स्वीकार

यहां से जो मैं हारी कहां जाऊंगी भगवान

दुनिया से मैं …

मेरा तो क्या है मैं तो दुनिया से हारा

तुझसे ही पूछेगा संसार ये सारा

डूब रही क्यों नैय्या 2, तेरे रहते खेवन हार

यहां से जो मैं हारी कहां जाऊंगी भगवान

दुनिया से मैं …

सबको सुनाया मैंने अपना फसाना

सब ने बताया प्रभुवर तेरा ठिकाना

तुमको मैंने माना 2, मात-पिता परिवार

यहां से जो मैं हारी कहां जाऊंगी भगवान

दुनिया से मैं …