आरती श्री आचार्य विद्यासागर जी- Aarti Shree Vidyasagar Maharaj Ji

Acharya Shree Vidyasagar Ji Maharaj दिगम्बर जैन समाज के एक अत्यंत पूजनीय और आध्यात्मिक गुरु हैं, जिनका जीवन त्याग, तपस्या और ज्ञान का प्रतीक है। उनके अद्वितीय व्यक्तित्व, गहन विचारों और समाज सेवा के प्रति समर्पण ने उन्हें लाखों श्रद्धालुओं का मार्गदर्शक बना दिया है।

“आरती श्री विद्यसागर महाराज जी” एक ऐसी भक्ति रचना है जो न केवल उनके दिव्य गुणों का गुणगान करती है, बल्कि आत्मा की शुद्धि और आत्मबोध का संदेश भी देती है। यह आरती भक्तों के हृदय में भक्ति, श्रद्धा और आत्मिक शांति का संचार करती है।

Aarti Shree Vidyasagar Maharaj Ji Ki

विद्यासागर की, गुणआगर की, शुभ मंगल दीप सजाय के।
आज उतारूँ आरतिया…..॥1॥

मल्लप्पा श्री, श्रीमती के गर्भ विषैं गुरु आये।
ग्राम सदलगा जन्म लिया है, सबजन मंगल गाये॥
गुरु जी सब जन मंगल गाये,
न रागी की, द्वेषी की, शुभ मंगल दीप सजाय के।
आज उतारूँ आरतिया…..॥2॥

गुरुवर पाँच महाव्रत धारी, आतम ब्रह्म विहारी।
खड्गधार शिवपथ पर चलकर, शिथिलाचार निवारी॥
गुरुजी शिथिलाचार निवारी,
गृह त्यागी की, वैरागी की, ले दीप सुमन का थाल रे।
आज उतारूँ आरतिया…..॥3॥

गुरुवर आज नयन से लखकर, आलौकिक सुख पाया।
भक्ति भाव से आरति करके, फूला नहीं समाया॥
गुरु जी फूला नहीं समाया,
ऐसे मुनिवर को, ऐसे ऋषिवर को, हो वंदन बारम्बार हो।
आज उतारुँ आरतिया…..॥4॥