ज्ञान सम्यक मेरा हो गया – Jain Bhajan

“ज्ञान सम्यक मेरा हो गया” एक अत्यंत सुंदर और प्रेरणादायी जैन भजन है, जो साधक के हृदय में सम्यक ज्ञान के उदय से उत्पन्न आनंद, शांति और विवेक को अभिव्यक्त करता है। इस भजन में भक्त अनुभव करता है कि गुरु के उपदेश और जिनवाणी के प्रभाव से उसे सच्चे मार्ग की पहचान मिल गई है, जिससे अज्ञान का अंधकार दूर हो गया है।

यह भजन हमें आत्म-जागृति, विवेक, श्रद्धा और सत्य के पथ पर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है। जब सम्यक ज्ञान प्राप्त होता है, तब मोह, मिथ्यात्व, कषायों से मुक्ति मिलती है और हृदय में एक अद्भुत आत्मिक आनंद प्रकट होता है — इस भजन में वही आनंद झलकता है।

Jain Bhajan

ज्ञान सम्यक मेरा हो गया,

मिथ्याभ्रम का अन्धेरा विलय हो गया ।

दृष्टि एकान्त की ही बनी थी मेरी,

और अनेकान्त से बेखबर मैं रहा

स्याद्वादी सहज हो गया,

ज्ञान में ज्ञान का ज्ञान अब हो गया ॥१॥

माना अपना उसे जो ना अपना हुआ,

जो था अपना उसी से पराया रहा

भेदविज्ञान अब हो गया,

एक अभेद की धारा में, मैं बह गया ॥२॥

वीतरागी प्रभु, वीतरागी गुरु,

मोक्ष की मानो, तैयारी हो गयी शुरू

धन्य नरभव, मेरा हो गया,

राग जाने न जाने कहाँ खो गया ॥३॥

दृष्टि में आतमा भक्ति परमात्मा

ऐसी आराधना हो सिद्धात्मा,

मार्ग ऐसा मुझे मिल गया

मानो भव के भ्रमण के हरण हो गया ॥४॥

ज्ञान सम्यक मेरा हो गया,

मिथ्याभ्रम का अन्धेरा विलय हो गया।