श्री बड़े बाबा विधान – Shri Bade Baba Vidhan
पूज्य आर्यिका श्री विज्ञानमति माताजी कृत
(दोहा)
पूज्य बड़े बाबा तुम्हें, कोटि-कोटि परणाम।
थुति करता हूँ चाव से, मिट जावे भव नाम ॥
(पद्धरी)
जय पूज्य बड़े बाबा महान, तुम दर्शन से हो पाप हान।
सब दोष विनाशक धीर वीर, मम दोष विनाशो गुण गरीर॥
मैं दरशन कर जो नन्द पाय, वो कह सकता ना शब्द माय।
है गद-गद वाणी पुलक देह, है केवल तुममें मम सनेह॥
मैं हर्षित होकर नाच नाच, मम इष्ट पूज्य हो आप साँच ।
मैं ठुमक ठुमक कर दऊँ ताल, मैं चलना चाहूँ आप चाल॥
मैं हरिहर आदिक देव देख, ना तुष्ट हुआ हूँ हे विशेख ।
सो आया सबको छोड़ आज, मैं वंदन करहूँ सिद्ध काज॥
मैं तननं-तननं तुरहि देय, मैं घननं-घननं घण्ट देय।
मैं ढम-ढम-ढम-ढम-ढोल बजा, मैं पूजूँ मेटो जनम सजा॥
तव दर्शन से हो अग्नि नीर, तव पर्शन से मिट जाय पीर।
हो पापी के भी पाप नाश, पुनवान बढ़ेंगे मोक्ष पास॥
मैं पर्वत चढ़कर निकटआय, सब मिटा परिश्रम आप पाय।
तुम कर्म रहित हो वीतराग, है मेरा तुमसे परम राग॥
दृग ज्ञान सुदर्शन सौख्य वीर्य, ना होते तुममें कभी शीर्य।
त्रयलोकालोकं रहे जान, है उसका फिर भी नहीं मान॥
सुर शक्री-चक्री पड़े पाद, पा जाने समकित सत्य खाद।
जो एक बार भी करे दर्श, ना होवे तन-मन कभी कर्श ॥
वो फिर-फिर आवे आप चरण, ना तजता क्षण भर आप शरण।
गुरु विद्यासागर सूरि देव, तव दर्श करन को आप गेह॥
वे दरशन करके रीझ गये, वे पुनः पुनः आ शीश नये।
फिर मंदिर नूतन बनवाया, जब बाबा को था पधराया॥
वह दृश्य देखने लायक था, हर बच्चा उसका भावक था।
तब हर्ष अश्रु भी झलक रहे, ना दर्शक की वा पलक नये॥
यह मंदिर कितना है विशाल, यह संरक्षा की है मिशाल।
औ दीक्षा दीनी नेक यहाँ, यह गुरू कृपा है आज यहाँ॥
हम सबही उनके शिष्य रहे, हम भक्ति करे यह इष्ट अये।
अब मन में मेरे नहीं आस, मैं केवल तुमरा रहूँ दास॥
मैं बलि-बलि जाऊँ दिवस रात, मैं भव-भव पाऊँ आप साथ।
मम मोठे बाबा वर्ष-वर्ष, जयवंत रहे हो हर्ष-हर्ष॥
गुरु छोटे बाबा कोटि वर्ष, इह दरशन देवे देय पर्श।
हम दरशन पा द्वय बाबा के, हम बचे कर्म के धावा से॥
मैं नन्त-नन्तशः नमन करूँ, मैं शिव मारग पर गमन करूँ।
मैं तब तक पूजूँ आप पाद, ना होवे जब तक मुक्ति साथ॥
(दोहा)
महिमा तुमरी हे प्रभो, कह सकता है कौन?।
बृहस्पती भी हारकर, ले लेता है मौन॥
इति परिपुष्पाञ्जलिं क्षिपामि !
विधान पूजा
स्थापना
(ज्ञानोदय)
मोठे बाबा बहुत बड़े है, बुंदेली में सबसे ही।
बड़े कहे हैं कुण्डलपुर में, महिमाशाली सबमें जी॥
श्रीधर स्वामी इसी क्षेत्र से, मोक्ष गये हैं भव छोड़ा।
सिद्धक्षेत्र का अतिशय भारी, हमने भी आ मन जोड़ा॥
(दोहा)
पूज्य बड़े बाबा प्रभु, श्रीधर श्रेष्ठ महान्।
सन्निधि थापन उर बुला, अहनिशि पूजूँ आन॥
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अत्र अवतर अवतर संवौषट् इति आह्वानम्।
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ।
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम्।
(घत्ता)
मैं स्वर्णिम झारी, में जल डारी, हे शिवकारी गुण गाऊँ।
मम जन्म मिटा दो, जरा बढ़ा दो, मृत्यु नशा दो पद आऊँ।
हे बाबा मंगल, मेटो दंगल, मिथ्या जंगल में उलझा।
मैं महिमा सुनके, तुमको भजके, पूजा करके अब सुलझा॥
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्ह नमः जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
शुभ मलया चंदन, काटो बंधन, करके वंदन शरण गहूँ।
मैं शीतल बनने, आतप हरने, अर्चन करने चरण चहूँ ॥
हे बाबा……………………………………….. ||
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्ह नमः संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
ये अमल अखण्डित, सौरभ मण्डित, करने खण्डित पाप तमम्।
मैं अक्षत लायो, थाल भरायो, मन हरषायो मेट ममम्’।।
हे बाबा मंगल, मेटो दंगल, मिथ्या जंगल में उलझा।
मैं महिमा सुनके, तुमको भजके, पूजा करके अब सुलझा॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अईं नमः अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
हे काम विभंगे ! रंग बिरंगे, सुरभित चंगे पुष्प लये।
बस ताप नाश दो, चरण वास हो, आप खास हो धर्म महे!॥
हे बाबा…………………………………………. ||
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अईं नमः कामबाणविध्वंशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
ले नैवज मीठे, विधि मल रूठे, तुम हो नीठे त्रिभुवन में।
मैं थाल भराऊँ, मंदिर आऊँ, क्षुधा नशाऊँ, चरणन में ॥
हे बाबा……………………………………….. ||
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्ह नमः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ये दीपक प्यारा, मणिमय न्यारा, आज उजारा देख तुम्हें।
सब मोह नशाने, ज्ञान सुपाने, दीप चढ़ाने भाग्य जगे ॥
हे बाबा…………………………………………… ||
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्ह नमः मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
ये धूप दशांगी, सुरभित संगी, हे शिवरंगी लाया हूँ।
मैं कर्म जलाने, तुम गुण पाने, धूप चढ़ाने आया हूँ।
हे बाबा……………………………………… ||
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्ह नमः अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
हे गुण-गण धारी! लौंग सुपारी, पिस्ता प्यारी ले आऊँ ।
दो मोक्ष महाफल, मेटो दल-दल, बनने अविचल नित ध्याऊँ ॥
हे बाबा……………………………………………….. ||
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्ह नमः मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
मैं द्रव्य सजाके, जल्दी आके, पूज रचाके हर्षित हूँ।
औ आप अमोलक, हे सुख गोलक, बजा सुढोलक अर्पित हूँ।
हे बाबा……………………………………………. ||
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्ह नमः अनर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
प्रत्येक-अर्घ
(दोहा)
अष्टक से मैं पूजकर, मुख्य गुणों को अर्घ।
देता हूँ गुण सिन्धु को, मिटे कर्म उपसर्ग ॥
इति मण्डलस्योपरि पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्क्षिपामि ॥
(ज्ञानोदय)
स्वेद नहीं हो चेतन में वह, मल है तन का क्यों आवे?।
स्वेदहीनता अतिशय प्रभु का, किसके मन को ना भावे॥
मंगल ग्रह भी मंगल कर दे, बाबा को जो अर्पित हो।
पूजन करके भक्ति भाव से, जीवन करे समर्पित औ ॥1॥
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अईं नमः निःस्वेदत्व जन्मातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
मल-मूत्रों के आँख नाक के, नव द्वारों के मल से भी।
रहित रहा तन पूजा से मम सुधर गये हैं परभव भी ॥
बृहस्पती सी बुद्धि बढ़ेगी बाबा तेरे दर पर आ।
श्रद्धा-पूर्वक अर्घ चढ़ावे, गुरु ग्रह भी तो भागे वा ॥2॥
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्ह नमः निर्मलत्व जन्मातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
दुग्ध समा है धवल रक्त जो, वत्सलता को बतलाता।
क्षेम-कुशल के काम देखकर, तीनलोक तव गुण गाता ॥
शुक्र ग्रहं क्या कर पायेगा, कुण्डलपुर के बाबा को ।
सुमरण करके जप करले तो, जग में उसका नामा हो ॥3॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्ह नमः क्षीरगौररुधिरत्व जन्मातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
ऐसा सुन्दर रूप कहीं ना, सुरनर किन्नर खगधर में।
देखा हमने बाबा जैसा रूप कहाँ है जगभर में ॥
मोह राहु भी तव अर्चा से, भगे राहु क्या कर पाये?।
तुमरे साथे बोल भव्य तू, क्यों ना प्रभु के गुण गाये ? ॥4॥
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अईं नमः समचतुरस्रसंस्थान जन्मातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्यो ऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
वज्रों से भी बलशाली तुम, तन से सबका हित होता ।
चूर दिये हैं आत्म शक्ति से, पूजक का भव मित होता ॥
क्रोध केतु भी तव चरणों की, आराधन से मिट जावे।
अहो केतु ग्रह कैसे बाबा, तुम भक्तों के टिक पावे ॥ 5 ॥
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्ह नमः वज्रवृषभनाराच संहनन जन्मातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्यो ऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सामुद्रिक शुभ लाञ्छन से ये, सुडौल सुन्दर अद्भुत औ ।
सौरूप्यं है अतिशय बाबा, वन्दक भी तो अद्भुत हो ।
सूर्य ग्रहों से ग्रसित हुये भी सूरज सम वो चमक उठे।
आ जावे दरबार आपके, आनन्दित हो फुदक उठे ॥ 6 ॥
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्ह नमः सौरुप्य जन्मातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्यो ऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
देह सुरभि से चम्प चमेली, पारिजात भी लज्जित हो।
बाबा भज लें आप चरण तो, प्रज्ञ जनों में सज्जित हो।
मिथ्यातम का शनि लागा जो, नन्तकाल से प्राणी के।
मिट जावे शनि रुके कहो क्या, शरण पाय सुखदानी जे ॥7॥
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्ह नमः सौगन्ध्य जन्मातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्यो ऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
एक सहस वसु लक्षण शोभित, आप वदन यह प्यारा है।
सहस भवों के पाप मेट कर, अर्चक लगता न्यारा है ॥
भूत पिशाचं आकर बाबा, लीन होय सब भूल गये।
सता सके क्या भूत कहो जो, तव चरणों की धूल गहे ॥8॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अईं नमः सौलक्षण्य जन्मातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्यो ऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
उपमा कैसे अतुल शक्ति की, हो सकती है किससे जी।
भक्त पुजारी बाबा तेरा, आगे होता सबमें जी ॥
जन्म-जरा के रोग मूल से, शरणागत के नाश करें।
कुष्ठ भगंदर आदि रोग क्या, रहे शीश जो पाद धरे ॥9॥
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अईं नमः अप्रमितवीर्य जन्मातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
मिष्ठ वचन को सुनकर लाडू, पेड़ा घेवर बावर भी।
फीके लगते पूजक के तो नहीं बचेंगे पातक जी ॥
सोम सौम्यता धरता जो भी सौम्य बिम्ब को पूजेंगे।
सोम ग्रहों का काम बचा क्या दुर्दिन सह भव रूठेंगे ॥10॥
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अईं नमः प्रियहितवादित्व जन्मातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्यो ऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(चौपाई )
चार शतक कोशों तक पूरी, दुर्भिक्षं से धरती दूरी।
रहती अतिशय बाबा तेरा, पूजन में मन लागा मेरा ॥11॥
मैं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्ह नमः गव्यूतिशत चतुष्टय सुभिक्षत्वघातिक्षय-जातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
पक्षी सम हो गगन बिहारी, बाबा तुमसे विधियाँ हारी।
लोक-अन्त में जाय बसे हो, पाद-पद्म उर आन बसे औ ॥12॥
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अईं नमः गगनगमनत्व घातिक्षयजातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
कुछ कम कोटी पूर्व वर्ष तक, बिन खाये भी पुष्ट रहा तन ।
भगवन भोजन कभी न करते, दुखियों के कष्टों को हरते ॥13॥
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्ह नमः भुक्त्यभाव घातिक्षयजातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
गमनों से वा दिव्य वाच से, प्राणी वध ना होय आप से।
अहोऽप्राणिवध अतिशय किसमें, हो सकता बस भगवन तुममें ॥14॥
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्ह नमः अप्राणिवधत्व घातिक्षयजातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
तीर्थंकर जो कर्म आपका, उपसर्गों से रहित आप वा।
अन-उपसर्गं अतिशय जैसा, अन्य कहाँ हो बाबा वैसा ॥15॥
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अईं नमः उपसर्गाभाव घातिक्षयजातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
सबको लगता प्रभु का आनन, मेरे आगे रहा आप तन।
चारों दिशि में दिखते सबको, आनन्द भारी बाबा हमको ॥16॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अईं नमः चतुर्मुखत्व घातिक्षयजातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सब विद्याएँ चेरी बनकर, रहती नित ही बाबा तुम पद ।
विद्येश्वर की पूजा कर लूँ, फिर क्यों ना मैं भव को तर लूँ।॥17।।
मैं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्ह नमः सर्वविद्येश्वरत्व घातिक्षयजातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अहा देह की छाया नाहीं, पड़ती भूपर तुमरी भाई।
अच्छायत्वं अतिशय कैसे, गावे हम हैं गूँगे जैसे ॥18॥
मैं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अईं नमः अच्छायत्व घातिक्षयजातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
आँखों की पलकें ना झपके, इनसे तो बस समता झलके ।
देखन की सब इच्छा त्यागी, थकें नहीं हैं ये बड़भागी ॥ 19 ॥
मैं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अईं नमः अपक्ष्मस्पंदत्व घातिक्षयजातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
नख केशों की वृद्धि रुकी है, इन्द्र मुकुट की मणी झुकी है।
परमौदारिक देह रही है, अतिशय है यह बात सही है । 20 ॥
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अईं नमः समान नख केशत्व घातिक्षयजातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(नरेन्द्र) (लय – शांतिनाथ के पद….)
अर्धमागधी भाषा सुनकर, असंख्यात भवि प्राणी।
एक साथ ही समझे बाबा, मिटे शंक दुख खानी ॥
तव दर्शन से निःशंकित हो, समकित भी पा जावे।
अज्ञानों का अंध मिटे तो, तम से क्यों भय खावे? ॥21॥
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अईं नमः सर्वार्धमागधी भाषा देवोपनीतातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सिंह गाय औ साँप नेवला, जन्म विरोधी जीवा ।
बैर भूलते तुम्हें देखकर, मिट जाती सब पीड़ा ।।
सर्व जीव में बने मित्रता, अतिशय भगवन तेरा।
कुण्डलपुर में दर्श करे जब, हर्षित हो मन मेरा ॥22॥
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अईं नमः सर्वजन मैत्री भाव देवोपनीतातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
षट् ऋतुओं के फल-फूलों से, लद जाते इक साथे ।
वृक्ष-लताएँ झाड़-झाड़ियाँ, मुकुलित हो चहकाते ॥
तेरी अर्चा करने वाले, पुत्र पौत्र यश पूजा।
पाते पल में धन-धान्यों को, उन सम ना हो दूजा ||23||
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्ह नमः सर्वर्तुफलादि शोभित तरु परिणाम देवोपनीतातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
आप विचरते जहाँ-वहाँ की, धरती दर्पण भाँती ।
निर्मल होती रत्न प्रपूरित, सब मन को हर्षाती ॥
चमक उठेगा तीन लोक में, रत्नों सम तुम सेवी।
पापों का प्रक्षालन करके, बन जावे वृष-नेमी ॥24 ।।
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्ह नमः आदर्शतलप्रतिमारत्नमयी देवोपनीतातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जिस दिशि में तुम विहरण करते, चले पवन अनुकूलं ।
मन्द-मन्द ही नहीं किसी को, वायु रहे प्रतिकूलं ॥
बाबा तेरे चरण पड़े तो, पाप पंक धुल जावे।
मन्द-मन्द ही कर्म उदय हो, कष्ट सभी भग जावे ॥25 ।।
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्ह नमः विहरणमनुगतवायुत्व देवोपनीतातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
तुम्हें देखकर कलिया मन की, खिलती पुलकित देही ।
हो जाते हैं आनन्द पाते, चाहे हो निर्नेही’ ॥
सुख में हो या दुख में होवे, गीत तुम्हारे गावे।
बाबा खुशियाँ जीवन भर हो, फूला नहीं समावे ॥26॥
नं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्ह नमः सर्वजनपरमानन्दत्व देवोपनीतातिशय गुणधारक जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।