श्री महावीर चालीसा – Shri Mahaveer Chalisa

महावीर चालीसा जैन धर्म में विशेष स्थान रखता है। महावीर चालीसा भगवान महावीर स्वामी के प्रति भक्ति और श्रद्धा प्रकट करने वाला एक लोकप्रिय स्तोत्र है। यह चालीसा जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर के जीवन, उनकी शिक्षाओं और उनके आदर्शों का वर्णन करती है। इसे पढ़ने से व्यक्ति को मानसिक शांति, आंतरिक शुद्धता और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है।

महावीर स्वामी ने अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह और अचौर्य जैसे पंचमहाव्रतों का प्रचार किया। महावीर चालीसा में उनके इन्हीं गुणों और उपदेशों को सरल शब्दों में प्रस्तुत किया गया है। यह चालीसा भक्तों को उनके आदर्श जीवन का अनुसरण करने की प्रेरणा देती है।

चालीसा का पाठ करने से मन में सकारात्मक विचार उत्पन्न होते हैं। यह हमें अहिंसा के मार्ग पर चलने, सच्चाई को अपनाने, और आत्म-नियंत्रण का अभ्यास करने की शिक्षा देती है। भगवान महावीर के उपदेशों के माध्यम से यह चालीसा हमें इस संसार के भौतिक सुखों से ऊपर उठने और आत्मा की शुद्धता पर ध्यान केंद्रित करने की प्रेरणा देती है।

महावीर चालीसा का नियमित पाठ करने से भक्तों में साहस, धैर्य और सहनशीलता का विकास होता है। यह न केवल जैन समुदाय बल्कि सभी धर्मों के अनुयायियों के लिए प्रेरणादायक है। भगवान महावीर के प्रति समर्पण और श्रद्धा का यह अनोखा तरीका भक्तों को आध्यात्मिक सुख और शांति प्रदान करता है।

Shri Mahaveer Chalisa

शीश नवा अरिहन्त को, सिद्धन करूँ प्रणाम।
उपाध्याय आचार्य का, ले सुखकारी नाम।
सर्व साधु और सरस्वती, जिन मन्दिर सुखकार।
महावीर भगवान को, मन-मन्दिर में धार।

जय महावीर दयालु स्वामी, वीर प्रभु तुम जग में नामी।

वर्धमान है नाम तुम्हारा, लगे हृदय को प्यारा प्यारा।

शांति छवि और मोहनी मूरत, शान हँसीली सोहनी सूरत।

तुमने वेश दिगम्बर धारा, कर्म-शत्रु भी तुम से हारा।

क्रोध मान अरु लोभ भगाया, महा-मोह तुमसे डर खाया।

तू सर्वज्ञ सर्व का ज्ञाता, तुझको दुनिया से क्या नाता।

तुझमें नहीं राग और द्वेष, वीर रण राग तू हितोपदेश।

तेरा नाम जगत में सच्चा, जिसको जाने बच्चा बच्चा।

भूत प्रेत तुम से भय खावें, व्यन्तर राक्षस सब भग जावें।

महा व्याध मारी न सतावे, महा विकराल काल डर खावे।

काला नाग होय फन धारी, या हो शेर भयंकर भारी।

ना हो कोई बचाने वाला, स्वामी तुम्हीं करो प्रतिपाला।

अग्नि दावानल सुलग रही हो, तेज हवा से भड़क रही हो।

नाम तुम्हारा सब दुख खोवे, आग एकदम ठण्डी होवे।

हिंसामय था भारत सारा, तब तुमने कीना निस्तारा।

जनम लिया कुण्डलपुर नगरी, हुई सुखी तब प्रजा सगरी।

सिद्धारथ जी पिता तुम्हारे, त्रिशला के आँखों के तारे।

छोड़ सभी झंझट संसारी, स्वामी हुए बाल-ब्रह्मचारी।

पंचम काल महा-दुखदाई, चाँदनपुर महिमा दिखलाई।

टीले में अतिशय दिखलाया, एक गाय का दूध गिराया।

सोच हुआ मन में ग्वाले के, पहुँचा एक फावड़ा लेके।

सारा टीला खोद बगाया, तब तुमने दर्शन दिखलाया।

जोधराज को दुख ने घेरा, उसने नाम जपा जब तेरा।

ठंडा हुआ तोप का गोला, तब सब ने जयकारा बोला।

मंत्री ने मन्दिर बनवाया, राजा ने भी द्रव्य लगाया।

बड़ी धर्मशाला बनवाई, तुमको लाने को ठहराई।

तुमने तोड़ी बीसों गाड़ी, पहिया खसका नहीं अगाड़ी।

ग्वाले ने जो हाथ लगाया, फिर तो रथ चलता ही पाया।

पहिले दिन बैशाख बदी के, रथ जाता है तीर नदी के।

मीना गूजर सब ही आते, नाच-कूद सब चित उमगाते।

स्वामी तुमने प्रेम निभाया, ग्वाले का बहु मान बढ़ाया।

हाथ लगे ग्वाले का जब ही, स्वामी रथ चलता है तब ही।

मेरी है टूटी सी नैया, तुम बिन कोई नहीं खिवैया।

मुझ पर स्वामी जरा कृपा कर, मैं हूँ प्रभु तुम्हारा चाकर।

तुम से मैं अरु कछु नहीं चाहूँ, जन्म-जन्म तेरे दर्शन पाऊँ।

चालीसे को चन्द्र बनावे, बीर प्रभु को शीश नवावे।

सोरठा :

नित चालीसहि बार, बाठ करे चालीस दिन।
खेय सुगन्ध अपार, वर्धमान के सामने।।
होय कुबेर समान, जन्म दरिद्री होय जो।
जिसके नहिं संतान, नाम वंश जग में चले।।