इंडिया नहीं ‘भारत’ बोलो: एक युगदृष्टा संत का राष्ट्र को आत्मबोध का आह्वान

Acharya Vidyasagar Ji Maharaj
प्रस्तावना: एक मौन क्रांति की गूँज सितंबर 2023 में जब नई दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित G20 शिखर सम्मेलन में वैश्विक नेताओं के सामने रखी तख्तियों पर "India" की जगह "BHARAT" चमक रहा था, तो दुनिया हैरान थी। लेकिन भारत के हृदयस्थल में रहने वाले करोड़ों लोगों के लिए यह कोई राजनीतिक पैंतरा नहीं, बल्कि एक महान संत की दशकों पुरानी तपस्या का फल था। दिगंबर जैन संत आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज ने वर्षों पहले यह नारा दिया था—"इंडिया नहीं, भारत बोलो"। यह केवल शब्दों का हेर-फेर नहीं था, बल्कि एक सोए हुए राष्ट्र की चेतना को जगाने का शंखनाद था।
1. गुलामी की संज्ञा बनाम गौरव की पहचान
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का स्पष्ट मत था कि 'इंडिया' शब्द एक औपनिवेशिक (Colonial) विरासत है। अंग्रेज जब इस देश में आए, तो उन्होंने अपनी सुविधा के लिए हमें 'इंडिया' कहना शुरू किया। आचार्य श्री अक्सर प्रवचनों में पूछते थे, "क्या दुनिया का कोई भी स्वाभिमानी देश अपनी पहचान उस नाम से रखता है जो उसके शोषकों ने उसे दिया हो?"
उन्होंने तर्क दिया कि नाम केवल पुकारने के लिए नहीं होता, नाम में संस्कार होते हैं। 'इंडिया' कहने से हम पश्चिम की नकल करने वाले एक पिछलग्गू राष्ट्र की तरह दिखते हैं, जबकि 'भारत' कहने से हम एक 5,000 साल पुरानी जीवंत सभ्यता के वारिस के रूप में उभरते हैं।
2. 'भारत' शब्द का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक अर्थ
आचार्य श्री ने 'भारत' शब्द की व्याख्या बहुत ही सुंदर ढंग से की थी। उन्होंने बताया कि:
भा (Bha): का अर्थ है 'प्रकाश' या 'ज्ञान'।
रत (Rat): का अर्थ है 'लीन' या 'लगा हुआ'।
अर्थात, वह देश जो अनादि काल से सत्य और ज्ञान के प्रकाश की खोज में लगा हुआ है, वही भारत है। उन्होंने जोर देकर कहा कि 'इंडिया' शब्द का कोई अपना अर्थ नहीं है, जबकि 'भारत' शब्द हमारी संस्कृति की आत्मा है। उनके अनुसार, जब हम 'भारत' बोलते हैं, तो हमारे भीतर एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है जो हमें हमारे ऋषियों, मुनियों और महापुरुषों से जोड़ता है।
3. G20 और सरकारी निर्णयों पर प्रभाव
आचार्य श्री का प्रभाव केवल मंदिरों तक सीमित नहीं था। देश के शीर्ष राजनेता, चाहे वे किसी भी दल के हों, उनके चरणों में शीश नवाते थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक, आचार्य श्री ने हर मंच से एक ही बात कही—"अपनी भाषा और अपने नाम पर गर्व करो।"
G20 के दौरान "President of Bharat" का उपयोग और हाल के वर्षों में भारतीय कानूनों (जैसे भारतीय न्याय संहिता) के नामों में बदलाव, आचार्य श्री के उसी 'भारतीयकरण' के स्वप्न का हिस्सा माना जाता है। उन्होंने राजनेताओं को सिखाया कि जब तक भारत अपनी शर्तों पर दुनिया से बात नहीं करेगा, तब तक वह 'विश्वगुरु' नहीं बन पाएगा।
4. भाषा और न्याय का स्वदेशीकरण
आचार्य श्री केवल नाम बदलने के पक्षधर नहीं थे, वे व्यवस्था परिवर्तन चाहते थे। उनके "भारत बोलो" दर्शन के तीन मुख्य स्तंभ थे:
मातृभाषा में शिक्षा: उनका मानना था कि विदेशी भाषा में शिक्षा बच्चों को अपनी संस्कृति से काट देती है। उन्होंने 'प्रतिभास्थली' जैसे स्कूलों के माध्यम से हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा का मॉडल पेश किया।
न्याय की भाषा: वे कहते थे कि भारत के गरीब किसान को यह समझ आना चाहिए कि जज ने उसके बारे में क्या फैसला सुनाया है। इसके लिए उन्होंने अदालतों में क्षेत्रीय भाषाओं के उपयोग की पुरजोर वकालत की।
स्वदेशी अर्थतंत्र: उन्होंने 'हथकरघा' (Handloom) को पुनर्जीवित किया ताकि गाँवों का पैसा गाँवों में रहे। उनके द्वारा प्रेरित 'श्रमदान' केंद्रों में आज हजारों युवा बिना बिजली की मशीनों के कपड़ा बनाकर स्वावलंबी बन रहे हैं।
5. मूकमाटी और राष्ट्रवाद का काव्य
आचार्य श्री द्वारा रचित महाकाव्य "मूकमाटी" इस दर्शन का जीवंत प्रमाण है। इसमें उन्होंने मिट्टी (आम आदमी) के माध्यम से यह समझाया है कि कैसे उसे तराश कर कलश (श्रेष्ठ नागरिक) बनाया जा सकता है। यह महाकाव्य केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि 'भारत' को समझने का एक दार्शनिक दस्तावेज है। उन्होंने सिखाया कि जैसे मिट्टी अपनी गंध नहीं छोड़ती, वैसे ही भारतीय को अपनी 'भारतीयता' नहीं छोड़नी चाहिए।
6. उपसंहार: आचार्य श्री की विरासत
फरवरी 2024 में डोंगरगढ़ (छत्तीसगढ़) में जब आचार्य श्री ने 'सल्लेखना' पूर्वक महासमाधि ली, तो पूरा राष्ट्र शोक में था। लेकिन उनका विचार अब एक आंदोलन बन चुका है। "इंडिया नहीं, भारत बोलो" आज केवल एक नारा नहीं है; यह नई पीढ़ी का संकल्प है।
आज जब हम देश को डिजिटल इंडिया से आगे बढ़कर 'विकसित भारत' के रूप में देखते हैं, तो हमें उस दिगंबर संत की याद आती है जिसने बिना कुछ मांगे इस देश को उसकी खोई हुई पहचान लौटा दी।